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माँ का दर्द - शहीद बेटे की अस्थियां 21-Feb-2020
पिछले 3 सालों से एक माँ अपने शहीद बेटे की अस्थियों को अपने पास रखकर शासन-प्रशासन से गुहार लगा रही है, की उसके शहीद बेटे को सम्मान दिया जाए, माँ शासन- प्रशासन सिर्फ इतना ही चाह रही है, की उसके गांव में संचालित स्कूल का नाम उसके शहीद बेटे के नाम से जाना जाए और गांव में शहीद बेटे का एक स्मारक बना दिया जाए, जो कि नियम में भी है। जिस थैले में कमजोर व असहाय माँ अपने शहीद बेटे की अस्थियों को लेकर चलती है अब वह थैली भी जवाब देने लग गया है, लेकिन इस बूढ़ी माँ की पुकार कोई नही सुन पा रहा है। जिले के डोंगरगांव विधानसभा क्षेत्र के सोनेसरार गांव का एक जवान हेमन्त महितकर 2013 में 10 वीं बटालियन छसबल में भर्ती होता है, जिसकी पदस्थापना प्रदेश के बीजापुर जिले के मिरतूर थाने में होती है। 03 मार्च 2017 को थाना क्षेत्र के चेटली चितौडीपारा में सड़क निर्माण का कार्य चल रहा होता है, जिसमें सड़क निर्माण कर रहे लोगों को सुरक्षा देने निकली फोर्स को जंगल मे घात लगाकर बैठे नक्सली हमला कर देते है जिसमे जवान हेमन्त महितकर शहीद हो जाता है। शासन- प्रशासन के नियमों के अनुसार जिस गांव का जवान शहीद होता है, उस गांव के स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखा जाए, और गांव में ही शहीद का एक स्मारक शहीद के नाम से बनाया जाए। लेकिन घटना को 3 साल बीत गए इस गांव में ऐसा कुछ देखने नही मिला, शहीद की बूढ़ी माँ ने बताया कि पुलिस विभाग के कुछ अधिकारियों ने उसे बताया था कि जिस दिन भी शहीद के नाम का स्मारक गांव में बनाया जाएगा, उसी स्मारक में शहीद की अस्थियों को डाल देना। शासन- प्रशासन ने नियमानुसार शहीद के स्मारक के लिए गांव के हाई स्कूल में जगह को चिन्हित किया और स्कूल का नामकरण के लिए स्कूल विभाग द्वारा प्रस्ताव भी बनाया गया,लेकिन जिस जगह का चयन किया गया, प्रशासन ने शहीद के परिजनों को जानकारी नही दी और पंचायत ने निर्माण कर डाला, जिस जगह पर शहीद का आधा अधूरा स्मारक बनाया गया वहां स्कूल के मल-मूत्र का पानी आता है, जिसे शहीद की माँ अपने बेटे का अपमान समझती है, उस समय से शहीद की माँ शासन- प्रशासन से गुहार लगा रही है कि निर्माण स्थल से कुछ ही दूरी पर स्मारक बनाया जाए जिससे स्मारक के नीचे उसके बेटे की अस्थियों पर मल-मूत्र का पानी ना पहुंचे। स्कूल के प्राचार्य का कहना है कि स्कूल का नाम शहीद के नाम पर करने के लिए कई बार प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है लेकिन गांव की पंचायत में सहमति नही बनने के कारण नामकरण नही हो पा रहा है। सोनेसरार गांव समुदाय विशेष गांव है, शहीद हरिजन वर्ग से आता है,ऐसा बताया जा रहा है कि गांव में हरिजन वर्ग के केवल 4 ही परिवार निवास करते है, समुदाय विशेष वर्ग के लोग अधिक होने के कारण भी स्मारक और स्कूल के नामकरण में दिक्कत आ रही है, क्योंकि स्मारक का निर्माण और स्कूल का नामकरण पंचायत को ही करना है, पंचायत में कई बैठक भी हो गई, लेकिन सहमति नही होने के कारण ना ही शहीद का स्मारक बन पा रहा है, और ना ही स्कूल का नामकरण हो पा रहा है, ऐसे में शहीद की माँ शासन-प्रशासन, स्थानीय नेता, विधायक, मंत्री, तात्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सभी से गुहार लगा चुकी है, लेकिन शहीद की माँ को पिछले 3 सालों से केवल आस्वाश्न ही मिल रहा है, जिस थैली में शहीद की अस्थियों को शहीद की माँ ने सहेज कर रहा है अब वो भी फटने लगी है। बेटा यदि सेना या फ़ौज में जाता है तो माँ बाप और पूरे गांव का सीना चौड़ा हो जाता है, और कहि मुठभेड़ में जवान बेटा शहीद हो जाता है, तो माँ- बाप का सिर फक्र से ऊंचा हो जाता है कि उनका बेटा देश के लिए शहीद हो गया, साथ ही उस गांव का नाम भी रोशन हो जाता है, जिस गांव का बेटा शहीद होता है, लेकिन इस गांव के लिए मानों शहीद जवान अभिश्राप हो गया हो। दुश्मन की गोली जातपात, धर्म, मज़हब नही पहचानती, ओ तो सिर्फ अपने लक्ष्य को भेददी है, फिर शहीद के सम्मान में जात-पात क्या होता है, जवान तो सिर्फ देश का होता है। पूरे मामले में जिले के एएसपी का कहना है, की विभाग ने स्मारक और स्कूल के नामकरण के लिए जिला कलेक्टर को लिख दिया है। बस इतना कहकर पुलिस विभाग के अधिकारी ने अपना पल्ला झाड़ लिया पिछले 3 सालों से एक तरफ बेटे को सम्मान दिलाने अधिकारियों और नेताओं के चक्कर, तो दूसरी तरफ बूढ़ी माँ के लिए तंगहाल जिंदगी, बेटे के शहीद होने के बाद बहू को बेटे की जगह अनुकंम्पा नियुक्ति मिली, उसने भी अपनी बूढ़ी सांस का घर छोड़ दिया, अब शहीद की माँ अपना गुजर बसर करने के लिए गांव में ही रोजगार गारंटी में मिट्टी खोदने जा रही है। जब से इस बूढ़ी माँ का बेटा शहीद हुआ है, प्रतिवर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को पुलिस विभाग शहीदों के परिजनों का सम्मान श्रीफल और साल भेंट कर करती है, हर बार शहीद की विभाग से आयोजन के दौरान विभाग के अधिकारियों से यही गुहार लगाती है , की उसके बेटे को सम्मान दिला दे, साल और श्रीफल की जरूरत मुझे नही है। पता नही शहीद बूढ़ी माँ को और कितना इंतजार करना पड़ेगा अपने शहीद बेटे को सम्मान दिलाने में और अब कब तक अपने सीने से लगा रखेगी अपने शहीद बेटे की अस्थियों को... विपुल कनैया (संवाददाता, राजनांदगांव)
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