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कब और कैसे घर पहुँचेंगे सड़कों पर कष्ट झेलते यह लोग ? 18-May-2020

इतनी पीड़ा - इतनी परेशानी और इतना लंबा सफर तो 1947 के भारत पाकिस्तान विभाजन के समय भी लोगों को नहीं झेलना पड़ा था

 

 

करोना वायरस की महामारी से निपटने के लिए किया गया लॉक डाउन 25 मार्च से 17 मई तक तीन बार हुआ - चौथा लॉक डाउन शुरू

विश्वव्यापी बीमारी से निपटने के लिए लाक डाउन तो जरूरी था परंतु साथ ही पहले लॉक डाउन के बाद दूसरा लाक डाउन लगाने से पहले पूरे हिंदुस्तान में फंसे जरूरतमंद यात्रियों तथा प्रवासी मजदूरों की वापसी की व्यवस्था भी जरूरी थी |

 

21 दिनों तक लाक डाउन का ईमानदारी से पालन करने के बाद लोग खाने पीने को मोहताज हो गए | सरकारों द्वारा राशन की व्यवस्था के दावे कितने सही होते हैं यह राजनेता, अधिकारियों की कार्यप्रणाली को बखूबी समझते हैं क्योंकि वास्तविक आंकड़ों और कागजी आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर होता है | चलो मान भी लिया जाए की मजबूर मजदूरों को सरकारों द्वारा राशन और भोजन उपलब्ध करवाया जा रहा था परंतु इतने लंबे समय के लिए सिर्फ राशन और भोजन काफी है ? - इसके अलावा गैस, बिजली, मकान किराया, सब्जी, दूध आदि की भी आवश्यकता होती है | इसके लिए भी मजदूर मजबूर हो गए और थक हार कर घर वापसी के लिए निकल पड़े | अब सवाल उठता है कि जब करोड़ों की संख्या में पूरे देश के मजबूर मजदूर अपने अपने घरों अपने-अपने प्रदेशों के लिए रवाना हुए तो सड़कों पर इनकी भीड़ को देखकर, इनकी परेशानियों को देखकर, बच्चों की तकलीफ को देखकर, बूढ़ों की परेशानियों को देखकर, धूप - पानी - बरसात में बिना भोजन, बिना दवाई के हजारों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकले इन मजदूरों की भीड़ पर इनकी व्यथा पर प्रदेश की सरकारों सहित केंद्र सरकार की नजर क्यों नहीं पड़ी ?

 

क्यों नहीं इन्हें घर पहुंचाने की व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा की गई ? और आज जब जगह-जगह मीडिया इनकी परेशानियों को जनता के सामने, अधिकारियों के सामने, नेताओं के सामने, सरकार के सामने ला रहा है तब भी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तू-तू मैं-मैं - वो तेरा वह मेरा का झगड़ा चल रहा है | सब राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग प्रदेशों की सरकारें एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, सब राजनीति कर रहे हैं क्यों ? - इतनी पीड़ा - इतनी परेशानी और इतना लंबा सफर तो 1947 के भारत पाकिस्तान विभाजन के समय भी लोगों को नहीं झेलना पड़ा था, जो लोग पैदल चले भी थे मुश्किल से 15 से 20 किलोमीटर बॉर्डर से इधर और बॉर्डर से उधर तक | परंतु आज देश में करोड़ों की संख्या में मजदूर मजबूर होकर हर तरह की पीड़ा - तकलीफ - डंडा - लाठी - एक्सीडेंट - बीमारी को सहकर भूखा प्यासा बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों, अपाहिजों सहित पैदल ही अपने घर जाने निकल पड़ा है - क्यों नहीं केंद्र सरकार अपने दम पर बिना राज्य सरकारों से पूछे इन मजदूरों को जो जिस प्रदेश का है उसके घर तक पहुंचाने की व्यवस्था करती ? - केंद्र सरकार पूरे भारत, पूरे हिंदुस्तान के लिए निर्वाचित सांसदों का प्रतिनिधित्व करती है - फिर क्यों उसे राज्य सरकारों की सहमति की आवश्यकता है ? जो लोग सड़कों पर मजबूरी वश असहनीय तकलीफें सहते चल रहे हैं उनका तो यह मानना है की कारोना से तो लोग कम मर रहे हैं परंतु इस तकलीफ दायक स्थिति में ज्यादा मर रहे हैं | जितना खर्च केंद्र एवं राज्य सरकारें इनके क्वॉरेंटाइन सेंटर में रहने खाने की व्यवस्था पर खर्च कर रहे हैं उससे कम खर्च में तो इन्हें घर पहुंचाया जा सकता है | रही बात परहेज की, स्वास्थ्य जांच की, क्वॉरेंटाइन की तो वह क्वॉरेंटाइन इनके गांव के पास भी करवाया जा सकता है | जिससे इनके मन में कम से कम तसल्ली तो रहेगी कि हम अपने घर के पास अपने गांव के बाहर स्वास्थ्य परीक्षण के लिए रुके हुए हैं | इन मजबूर मजदूरों की सड़कों पर आवाजाही तकलीफें हर व्यक्ति को द्रवित कर रही है, परंतु जवाबदार लोग सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं | अभी भी आज की तारीख में जो लोग सड़कों पर परिवार सहित घर पहुंचने के लिए पैदल चल रहे हैं उनमें पूरे हिंदुस्तान के सभी प्रदेशों के लोग हैं, जो कि टीवी चैनलों के रिपोर्टरों की रिपोर्ट में स्पष्ट नजर आ रहा है | परंतु राजनीति के चक्कर में कुछ प्रदेशों को घेरे में लेकर इन जरूरतमंदों के घर पहुंचने के रास्ते को आसान करने के बदले तेरे प्रदेश और मेरे प्रदेश के चक्कर में उनकी राह को और तकलीफ दायक बनाया जा रहा है | जिन लोगों के हाथ में पावर है उनसे हाथ जोड़कर - पैर पकड़कर निवेदन है की राजनीति छोड़कर सभी को जल्द से जल्द घर पहुंचाएं | भावनाओं में बहकर कुछ गलत लिखा गया हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं - जय हिंद जय भारत सुखबीर सिंघोत्रा 93010 94242

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