पितृ पक्ष में क्यों कराया जाता है कौवे को भोजन?

पितृ पक्ष में क्यों कराया जाता है कौवे को भोजन?

पितृपक्ष के दौरान कौवों का महत्व बढ़ जाता है. माना जाता है कि इसको ग्रास न दें, तो श्राद्ध कर्म पूरा ही नहीं होता. उसे अधूरा ही माना जाता है. इसलिए उन्हें भोजन खिलाने का विधान है.

पितृ दूत है कौवा: शास्त्रों में वर्णित है कि कौवा एक मात्र ऐसा पक्षी है जो पितृ-दूत कहलाता है. यदि पितरों के लिए बनाए गए भोजन को यह पक्षी चख ले, तो पितृ तृप्त हो जाते हैं. कौआ सूरज निकलते ही घर की मुंडेर पर बैठकर यदि वह कांव-कांव की आवाज निकाल दे, तो घर शुद्ध हो जाता है. धर्म शास्त्र श्राद्ध परिजात में वर्णन है कि पितृपक्ष में गौ ग्रास के साथ काक बलि प्रदान करने की मान्यता है. इसके बिना तर्पण अधूरा है. मृत्यु लोक के प्राणी द्वारा काक बलि के तौर पर कौओं को दिया गया. भोजन पितरों को प्राप्त होता है. कौआ यमस्वरूप है. इसे देव पुत्र कहा जाता है. रामायण में काग भुसुंडी का वर्णन मिलता है.

क्यों कौवे को पितरों के रूप में पूजा जाता है?

हिंदू धर्म में कौवों को पितरों का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि यह मान्यता है कि पितरों की आत्माएं कौए  के रूप में आकर अपने वंशजों से भोजन और पूजा ग्रहण करती हैं. यह मान्यता श्राद्ध और पितृ पक्ष के दौरान विशेष रूप से प्रचलित है. कौए बिना थके लंबी . दूरी की यात्रा तय कर सकते हैं. ऐसे में किसी भी तरह की आत्मा कौए के शरीर में वास कर सकती है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकती है. इन्हीं कारणों के ... चलते पितृ पक्ष में कौए को भोजन कराया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, जब किसी व्यक्ति की मौत होती है तो उसका जन्म कौआ योनि में होता है.