पत्रकारों के खिलाफ पुलिसिया रवैये पर उठ रहे गंभीर सवाल : पत्रकार हुए एकजुट

पत्रकारों के खिलाफ पुलिसिया रवैये पर उठ रहे गंभीर सवाल : पत्रकार हुए एकजुट

क्या चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश हो रही है? पत्रकारों के खिलाफ पुलिसिया रवैये पर उठ रहे गंभीर सवाल

रायपुर। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यदि किसी से दिखाई दे रही है तो वह स्वयं व्यवस्था का एक हिस्सा बन चुके कुछ पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों का रवैया है। लगातार ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं कि पत्रकारों को कानून के दायरे में संरक्षण देने के बजाय उन्हें डराने, धमकाने और उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है।

पत्रकार संगठनों और मीडिया जगत में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि कई मामलों में पत्रकारों के साथ मारपीट, प्रताड़ना, झूठे मुकदमे दर्ज करने, मीडिया संस्थानों को बंद कराने की धमकी देने और समाचार संकलन के दौरान कैमरा चलाने से रोकने जैसी घटनाएं सामने आई हैं।

हाल ही में तेलीबांधा थाना सिपाहियो द्वारा पत्रकार से मारपीट करने,गाली गलौज करने के मामले की थानेदार को सूचना देने के बाद तेलीबांधा थाने के थानेदार अजय झा द्वारा पत्रकार को कुंडली निकालने, देख लेने, मां बहन की गाली देकर अपमानित करने, देख लेने की धमकी देने के मामले को लेकर पत्रकारों ने थाने का घेराव किया थानेदार से सवाल किया जो चर्चा का विषय है परंतु एसीपी डीसीपी और पुलिस कमिश्नर द्वारा जांच कार्यवाही करने की बात पत्रकारों के गले नहीं उतरी |

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में पत्रकार केवल तब तक सम्मानित रहेंगे जब तक वे सत्ता और प्रशासन की प्रशंसा करते रहेंगे?

विडंबना यह है कि जब पुलिस विभाग को अपनी उपलब्धियों, अभियानों और कार्यवाहियों का प्रचार-प्रसार करना होता है तो पत्रकारों को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। थानों से लेकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय, कमिश्नर कार्यालय और बड़े आयोजनों तक पत्रकारों को बुलाया जाता है, बैठाया जाता है, चाय-नाश्ता कराया जाता है और कई बार सम्मानित भी किया जाता है।

उस समय न तो पत्रकार फर्जी दिखाई देते हैं, न उनकी कार्यप्रणाली संदिग्ध लगती है और न ही उन्हें ब्लैकमेलर कहा जाता है।

लेकिन जैसे ही कोई पत्रकार पुलिस विभाग की कथित खामियों, लापरवाही या विवादित कार्यप्रणाली को जनता के सामने लाने का प्रयास करता है, आरोप है कि उसका रवैया अचानक बदल जाता है। कई पत्रकारों का कहना है कि उन्हें डराने-धमकाने, बदनाम करने और यहां तक कि अपराधी की तरह पेश करने का प्रयास किया जाता है।

यह स्थिति केवल पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।

पत्रकारों का कहना है कि प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जहां बिना पर्याप्त जांच के दुर्भावनावश पत्रकारों पर अपराध दर्ज कर दिए गए। जबकि लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि पत्रकारों से जुड़े मामलों में विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए और किसी भी शिकायत की पहले वरिष्ठ स्तर पर निष्पक्ष जांच हो, उसके बाद ही कार्रवाई की जाए।

सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर प्रदेश सरकार और गृह विभाग इस विषय पर स्पष्ट और कठोर दिशा-निर्देश जारी क्यों नहीं करते?

राजनीतिक परिदृश्य पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। विपक्ष में रहते हुए लगभग हर राजनीतिक दल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही दल पुलिस विभाग का बचाव करता हुआ दिखाई देता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या सत्ता बदलने से पुलिस व्यवस्था की खामियां समाप्त हो जाती हैं या फिर राजनीतिक सुविधानुसार नजरिया बदल जाता है?

लोकतंत्र में पत्रकार और पुलिस दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस कानून व्यवस्था की रक्षक है तो पत्रकार जनता और शासन के बीच पारदर्शिता का माध्यम हैं। यदि इन दोनों संस्थाओं के बीच टकराव की स्थिति बनेगी तो सबसे अधिक नुकसान आम जनता को होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रदेश भर के पत्रकार व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी संवैधानिक और पेशेवर स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एकजुट हों। साथ ही सरकार को भी पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर ठोस पहल करनी चाहिए, ताकि पत्रकारों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित हो सके।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृह विभाग पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्र पत्रकारिता और पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर क्या ठोस कदम उठाते हैं।

क्योंकि लोकतंत्र में यदि चौथा स्तंभ भय और दबाव में काम करेगा, तो अंततः उसकी कीमत पूरे समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।