बिहार और गुजरात में पुल हादसों की बाढ़ : वडोदरा के आनंद पुल कांड ने खोली लापरवाह सिस्टम की पोल, न ठेकेदार गिरफ्तार, न अधिकारी जेल में
कब तक चलेगा यह ‘ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़’ का मौत का खेल?
बिहार और गुजरात में पुल हादसों की बाढ़ : वडोदरा के आनंद पुल कांड ने खोली लापरवाह सिस्टम की पोल, न ठेकेदार गिरफ्तार, न अधिकारी जेल में |
देश में गुणवत्ताहीन निर्माण और लापरवाह तंत्र ने एक बार फिर इंसानी जानों की कीमत वसूली है। गुजरात के वडोदरा जिले में स्थित आनंद पुल के टूटने से कई लोग मौत के शिकार हो गए, कई घायल हैं, और एक बार फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है — कब तक चलेगा यह ‘ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़’ का मौत का खेल?

वडोदरा की यह घटना बिहार में बीते कुछ वर्षों में घट चुकी कम से कम 9 पुलों के ढहने की घटनाओं से बिल्कुल मिलती-जुलती है। दोनों ही राज्यों में पुलों का निर्माण करोड़ों रुपये की लागत से हुआ, लेकिन कुछ ही वर्षों में वह जर्जर होकर ढह गए।
गुजरात के आनंद जिले में हाल ही में गिरे इस पुल के देखरेख में लापरवाही का जीता जागता उदाहरण है |
जानकारी के अनुसार इस पुल के क्रेक होने की शिकायत स्थानीय लोगों द्वारा शासन से की जा चुकी थी परंतु शिकायत की अनदेखी इस बड़े हाथ से का कारण बनी |
बिहार की बात करें तो गोपालगंज, सहरसा, अररिया, मधेपुरा, किशनगंज, और भागलपुर जैसे जिलों में बीते दो साल में 9 से अधिक पुल ध्वस्त हो चुके हैं। इन पुलों पर भी करोड़ों रुपये खर्च हुए थे, लेकिन नतीजा वही – गुणवत्ता की अनदेखी और प्रशासनिक मिलीभगत।

पिछले दिनों हुए तमाम पल हादसों में अब तक नहीं हुई किसी की गिरफ्तारी
इन दोनों राज्यों में जिम्मेदार ठेकेदारों को सिर्फ "ब्लैकलिस्ट" किया गया है। किसी भी ठेकेदार की गिरफ्तारी नहीं हुई। वहीं, प्रशासनिक अधिकारियों को सिर्फ "सस्पेंड" कर खानापूर्ति कर दी गई।
यह सिर्फ एक लीपापोती है – जबकि इन घटनाओं में लोगों की जान गई है, सरकार का करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ है, और आम जनता में भय और आक्रोश फैला है।
इन हादसों को राष्ट्रद्रोह माना जाना चाहिए
जब पुल का निर्माण देश के धन से होता है और उसकी गुणवत्ता में समझौता कर देश के नागरिकों की जान जोखिम में डाली जाती है, तो यह सीधे-सीधे राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में क्यों नहीं आता?
देश के कानून में इस तरह की लापरवाही पर "राष्ट्रद्रोह" के तहत मामला दर्ज होना चाहिए, जिम्मेदारों को जेल भेजा जाना चाहिए और उनकी संपत्ति जब्त कर जनता से लिए गए टैक्स और सरकारी नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए।
यदि यही रवैया रहा तो हादसों की संख्या बढ़ती जाएगी

क्योंकिठेकेदारों को सिर्फ ब्लैकलिस्ट कर छोड़ दिया जाता है और अधिकारियों को सिर्फ निलंबित कर दिया जाता है, ऐसे में यह व्यवस्था भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इससे अगली बार और भी ठेकेदार निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता करेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि "कोई कार्रवाई नहीं होगी"।
गुजरात के वडोदरा और बिहार में पुल टूटने की घटनाएं एक गंभीर राष्ट्रीय संकट की तरफ इशारा करती हैं।
यह महज तकनीकी गलती नहीं है, यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं है, यह जनता की जान से खिलवाड़ है।
जब तक दोषियों को कानूनी कठघरे में लाकर कड़ी सजा नहीं दी जाती, जब तक उनकी संपत्तियां जब्त कर भरपाई नहीं की जाती,
जब तक उन्हें देशद्रोही की तरह सजा नहीं दी जाती, तब तक देश की सड़कें और पुल इसी तरह लोगों की जान लेते रहेंगे।
यह पुल हादसे
देश में बढ़ती पुल दुर्घटनाओं और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है। अब केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों को सिर्फ मुआवजा और निलंबन की बजाय दृढ़, कानूनी और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए ताकि इस सिलसिले पर विराम लगाया जा सके।
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