फसल अवशेष जलाने के दुष्प्रभाव एवं फसल अवशेष प्रबंधन

फसल अवशेष जलाने के दुष्प्रभाव एवं फसल अवशेष प्रबंधन

 फसल कटाई के बाद फसलों के ठूंठ किसान खेत में ही जला देते हैं, ताकि नई फसलों की बुवाई कर सकें। फसल अवशेष खेतों में जलाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती है, मित्र कीट नष्ट होते हैं, सूक्ष्म जीव पूरी तरह नष्ट हो जाते है, इससे ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बल मिलता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने फसल अवशेष को खेतों में जलाने हेतु प्रतिबंधित किया है।

फसल अवशेष जलाने के दुष्प्रभाव
फसल अवशेष जलाने से निकलने वाले धुंआ के जहरीली गैसों से वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। फसल अवशेष जलाने से मृदा का तापमान बढ़ जाता है, जिसके फलस्वरूप मृदा की संरचना बिगड़ जाती है। फसल अवशेष जलाने के कारण जीवांश पदार्थ की मात्रा कम हो जाने से मृदा की उर्वरता कम होने लगती है जिससे उत्पादकता कम होने का खतरा होता है। फसल अवशेष जलाने से उस पर आश्रित मित्र कीट मर जाते हैं, इससे मित्र कीट और शत्रु कीट का अनुपात बिगड़ जाता है। फलस्वरूप पौधों को कीट प्रकोप से बचाने के लिए मजबूरन महंगे एवं जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिसका दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है।
फसल अवशेष का प्रबंधन कैसे करें
फसल अवशेष प्रबंधन के संबंध में जानकारी देते हुए कृषि विभाग के उप संचालक  जितेन्द्र कोमरा ने बताया कि फसल कटाई के उपरांत खेतों में पड़े हुए पैरा, भूसा आदि को गहरी जुताई कर पानी भरने से फसल अवशेष कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे अगली फसल के लिए मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। फसल कटाई उपरांत खेत में बचे हुए फसल अवशेषों को इकट्ठा कर कम्पोस्ट गड्ढे में या वर्मी कम्पोस्ट टांके में डालकर कम्पोस्ट बनाने के लिए उपयोग किया जावे। फसल कटाई उपरांत खेत में फसल अवशेष पड़े रहने के बाद भी बिना जलाये बीजों की बोनी हेतु जीरो सीड्स-कम-फर्टिलाईजर-ड्रील, हैप्पी सीड्र इत्यादि बोनी यंत्र तथा फसल अवशेष प्रबंधन के यंत्रो का उपयोग किये जाने से बीज का प्रतिस्थापन उपयुक्त नमी स्तर पर होता है, साथ ही ऊपर बिछे हुए फसल अवशेष नमी संरक्षण का कार्य, खरपतवार नियंत्रण एवं बीज के सही अंकुरण के लिए मल्चिंग का कार्य करता है। फसल अवशेष को रोटावेटर एवं मल्चर का उपयोग करके अवशेष को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकार मिट्टी में मिलाया जा सकता है, 15 से 30 दिनों में अवशेष सड़कर खाद के रूप में उपलब्ध होकर मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है।