*विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विपक्ष की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण — छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज*

*विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विपक्ष की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण — छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज*

*विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विपक्ष की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण — छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज*

*जिन्ना के लिए पाकिस्तान बनाना था तो भारत की धरती से पंजाब और बंगाल के निर्दोष हिन्दू-सिखों को विभाजन की आग में क्यों झोंका गया?*

रायपुर, 14 अगस्त 2026।

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज ने वर्ष 1947 के भारत विभाजन में अपने प्राण गंवाने वाले लाखों निर्दोष नागरिकों तथा विस्थापित परिवारों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। समाज ने कहा कि 14 अगस्त केवल इतिहास की तारीख नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों के दर्द, आंसुओं, उजड़े घरों और बिछड़े अपनों की स्मृति का दिन है, जिनकी जिंदगी विभाजन ने हमेशा के लिए बदल दी।

छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज के प्रदेश अध्यक्ष सुखबीर सिंह सिंघोत्रा ने कहा कि विभाजन की त्रासदी को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और ऐतिहासिक सच्चाई के साथ देखने की आवश्यकता है। 1947 में भारत का विभाजन हुआ, पंजाब और बंगाल का भी विभाजन किया गया और करोड़ों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा। ब्रिटिश भारत के विभाजन ने हिन्दू, सिख और मुस्लिम समुदायों की आबादी को व्यापक रूप से प्रभावित किया और इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापनों में से एक को जन्म दिया।

सिंघोत्रा ने सवाल उठाया कि यदि मोहम्मद अली जिन्ना की मांग के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण किया गया था, तो उस पाकिस्तान की सीमा के भीतर पंजाब और बंगाल के उन क्षेत्रों को क्यों शामिल किया गया जहां पीढ़ियों से हिन्दू और सिख रहते आए थे? अपने पुरखों की जमीन, खेत, मकान, गुरुद्वारे, मंदिर और व्यापार छोड़कर लाखों लोगों को शरणार्थी बनकर भारत आना पड़ा। विशेष रूप से पंजाब की विभाजन त्रासदी सिक्ख समाज की सामूहिक स्मृति में आज भी गहरे दर्द के रूप में जीवित है।

उन्होंने कहा कि जिन परिवारों ने अपना सब कुछ गंवाया, जिन माताओं ने अपने बेटे खोए, जिन बहनों और बेटियों ने अपने परिवारों को बिखरते देखा और जिन बुजुर्गों को अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी—उनकी पीड़ा किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे भारत की पीड़ा है।

कांग्रेस और विपक्ष से छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज का सवाल

सुखबीर सिंह सिंघोत्रा ने कहा कि आजादी के इतने दशकों बाद भी यह प्रश्न देश के सामने खड़ा है कि 1947 की विभाजन त्रासदी पर कांग्रेस और आज की अन्य प्रमुख विपक्षी पार्टियां खुलकर दुख व्यक्त करने से क्यों बचती रही हैं?

उन्होंने कहा कि आज जब देश विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के माध्यम से पीड़ितों को याद कर रहा है, तब राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर प्रत्येक राजनीतिक दल को उन लाखों निर्दोष लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करनी चाहिए थी।

“क्या विभाजन में मारे गए लोग किसी एक विचारधारा के थे? क्या अपना घर और जन्मभूमि खोने वाले शरणार्थियों का दर्द किसी पार्टी का था? क्या पंजाब और बंगाल के उन परिवारों की पीड़ा को राजनीतिक बहस में भुला दिया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने सामने अपने परिवार और अपनी संपत्ति को उजड़ते देखा?” — यह सवाल छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज ने विपक्षी दलों से किया है।

समाज ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में स्मरण करने की पहल का उद्देश्य इसी ऐतिहासिक पीड़ा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और विभाजन के घावों को भुलाने के बजाय उनसे सीख लेना है। यह दिवस 2021 से मनाया जा रहा है।

इतिहास को दबाने के बजाय स्वीकार करने की जरूरत

सिंघोत्रा ने कहा कि विभाजन के लिए जिम्मेदारी तय करने पर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हो सकते हैं और इसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति, मुस्लिम लीग की मांग तथा तत्कालीन भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों सहित अनेक ऐतिहासिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है। लेकिन एक बात निर्विवाद है कि आम जनता ने इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाई।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज किसी समुदाय के खिलाफ नफरत की राजनीति नहीं चाहता। समाज की मांग केवल इतनी है कि 1947 के पीड़ितों की पीड़ा को ईमानदारी से स्वीकार किया जाए, इतिहास को भुलाया न जाए और आने वाली पीढ़ियों को यह बताया जाए कि देश का विभाजन किस प्रकार लाखों परिवारों के लिए विनाशकारी साबित हुआ।

उन्होंने कहा कि सिक्ख समाज ने हमेशा देश की एकता, अखंडता और भाईचारे के लिए अपना योगदान दिया है और आगे भी देता रहेगा। विभाजन की पीड़ा को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा पैदा न होने देना है।

छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज के प्रदेश अध्यक्ष सुखबीर सिंह सिंघोत्रा, नरेंद्र सिंह हरगोत्रा, स्वर्ण सिंह चावला, कुलवंत सिंह खालसा, मनजीत सिंह भाटिया, बाबा बुड्ढा जी साहेब गुरुद्वारा के प्रधान हरकिशन सिंह राजपूत, देवेंद्र सिंह चावला, जसप्रीत सिंह चावला, इकबाल सिंह होरा, रणजीत सिंह खनूजा, अमृत सिंह सूर, इंदर पाल सिंह गांधी, गुरमीत सिंह छाबड़ा, मानवेंद्र सिंह डडियाला, जागीर सिंह बावा, नरेन्द्र सिंह चावला, बंटी जुनेजा, हरमिंदर सिंह राजू छाबड़ा, अत्तर सिंह सहित समाज ने देश के सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर 1947 के विभाजन के सभी पीड़ितों—हिन्दू, सिख और मुस्लिम—को श्रद्धांजलि दें और यह संकल्प लें कि भारत की एकता, अखंडता, सामाजिक सद्भाव और भाईचारे को कभी कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।