जनजातीय परंपरा को सहेजने व संवारने मुख्यमंत्री श्री साय की अनूठी पहल : विधायक श्री नेताम

जनजातीय परंपरा को सहेजने व संवारने मुख्यमंत्री श्री साय की अनूठी पहल : विधायक श्री नेताम

आदिवासी परंपरा, संस्कृति और कला के प्रदर्शन से लकदक हुआ भीरावाही का गोंडवाना भवन
बस्तर पंडुम के जिला स्तरीय आयोजन में झलकी आदिवासियों की पारंपरिक विरासत
सभी ब्लॉक से आए आदिवासियों ने प्रदर्शनी लगाकर दी व्यंजन, आभूषण, सभ्यता की जानकारी
जनजातीय परंपरा को सहेजने व संवारने मुख्यमंत्री श्री साय की अनूठी पहल : विधायक श्री नेताम

उत्तर बस्तर कांकेर, 28 जनवरी 2026/ बस्तर पंडुम-2026 का जिला स्तरीय एक दिवसीय आयोजन आज जिला मुख्यालय से लगे ग्राम पंचायत भीरावाही के गोंडवाना समाज भवन परिसर में किया गया, जिसमें बस्तर की आदिवासी जनजातियों के पारंपरिक रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, आभूषण, लोक नृत्य, लोक गीत व प्राचीन सभ्यताओं का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान जिले के सातों विकासखण्ड से आए समूहों के द्वारा स्टॉल लगाकर जनजातीय परंपराओं से अवगत कराया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर कांकेर विधायक  आशाराम नेताम उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि की आसंदी से विधायक श्री नेताम ने जिला प्रशासन के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि आदिवासी मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय द्वारा विलुप्त हो रही जनजातीय परंपरा एवं संस्कृति को सहेजने, संवारने एवं संरक्षित करने की दिशा में बेहतर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार की इस पहल का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ना व लोक परंपराओं को अक्षुण्ण रखना है। विधायक श्री नेताम ने आगे कहा कि आदिवासियों की वास्तविक पहचान उनकी परंपरा, संस्कृति, रीति-रिवाज तथा पूजा पद्धति से है, जिसे पुनर्जीवित करने का जिम्मा प्रदेश सरकार ने उठाया है और बस्तर पंडुम का आयोजन इसी ध्येय से किया जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी को शिक्षित होने के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़कर रहने की भी जरूरत है। जिला पंचायत की अध्यक्ष श्रीमती किरण नरेटी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जनजातीय समाजों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। समाज की युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। बस्तर पंडुम के माध्यम से यहां की आदिवासी परंपराओं को सहेजने का कार्य सरकार द्वारा की जा रही है। कार्यक्रम में कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने संबोधित करते हुए कहा कि बस्तर आने के बाद पता चला कि आदिवासियों में इतने विविध प्रकार के व्यंजन, वेशभूषा और जनजातीय परंपराएं हैं। यह अच्छी बात है कि बस्तर अंचल की जनजातियां अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता को संजोकर रखी है। यहां के लोक नृत्य, लोक गीत और प्राचीन धरोहरों को संरक्षण प्रदान करने के लिए प्रदेश सरकार बस्तर पंडुम का आयोजन पहले विकासखण्ड स्तर पर, उसके बाद आज जिला स्तर पर तथा अगले सप्ताह संभाग स्तर पर जगदलपुर में किया जाएगा।
समूहों ने किया पारंपरिक व्यंजनों व वेशभूषाओं का प्रदर्शन
ग्राम पंचायत भीरावाही के गोंडवाना समाज भवन परिसर में आयोजित जिला स्तरीय बस्तर पंडुम में सभी सातों विकासखण्ड से आए समूहों के द्वारा स्टॉल लगाकर बस्तरिया व्यंजनों का प्रदर्शन किया गया। इनमें जय मॉ सरस्वती आदिवासी समूह साल्हेभाट कांकेर द्वारा छिन्दरस, करूकांदा, मोकइया, चापड़ा शरबत, झुनगा, जिर्रा टोपी, हिरवा घुघरी, इमली लाटा, काराखुला, सुक्सी, आमाखुला, सेमीखुला आदि का प्रदर्शन किया गया। इसी तरह रानी दुर्गावती आदिवासी समूह कांकेर द्वारा चना घुघरी, बड़ा घुघरी, अमारी चटनी, जिर्रागुंडा चटनी, मड़िया बर्फी, कोदो खीर, गुड़ तिखुर और ज्वार लड्डू, गुलगुल भजिया, बोबो बड़ा, सुक्सी टमाटर, मुठिया, चीला रोटी, पान रोटी, मड़िया रोटी, चिंगरी सुक्सी, चना आमट, हिरवा बेसन आदि 49 प्रकार के व्यंजनों का प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा वन कन्या समूह कोयलीबेड़ा, बस्तरहीन लया चिल्हाटी, बेलोसा आदिवासी महिला समूह दुर्गूकोंदल, उजंतीन मंडावी गु्रप पोड़गांव अंतागढ़ आदि समूहों की महिलाएं कुटकी भात, कोदो भात, मुनगा भाजी, पान रोटी, ज्वार लाई, जोंधरा लाई, कोचई कांदा, डांग कांदा, केशरवा कांदा, नांगर कांदा, मड़िया पेज, बटरा होरा, चना होरा जैसे व्यंजनों के अलावा सल्फी, महुआ मंद, बोइर, डुमर फल आदि सहित इन्हें रखने का पारंपरिक बांस व तुमा से निर्मित पात्र, टोकरी आदि का भी प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा पारंपरिक आभूषणों के स्टॉल में जनजातीय आभूषण जैसे- बनुरिया, पैरी, ककई, तोड़ा, सांटी, धमेल, बंधा, डोरा, ऐंठी, खोंचनी आदि, हायर सेकण्डरी स्कूल ईच्छापुर कांकेर की ओर से कुपही खिनवा, कौड़ा माला, ढोकरा (बेलमेटल), सिहारी माला, लचकारा, डब्बुंग, मुंदरी, कड़ा, पाटा (साड़ी) की प्रदर्शनी लगाई गई, जिसका अवलोकन विधायक श्री नेताम एवं कलेक्टर श्री क्षीरसागर सहित सभी मचस्थ अतिथियों ने किया व पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद चखा।
बस्तर पंडुम : परंपरागत वैद्य व वनौषधि को पुनर्स्थापित करने की कवायद
जिला स्तरीय बस्तर पंडुम में परंपरागत वैद्य एवं जड़ी बूटियों से निर्मित वनौषधियों को विशेष तौर पर महत्व दिया गया। भारत की प्राचीन आयुर्वेद उपचार पद्धति को आगे लाने के उद्देश्य से परंपरागत वैद्य तथा वनौषधियों के जानकार लोगों को स्टॉल में विशेष रूप से स्थान दिया गया। वैद्यों के द्वारा विभिन्न व्याधियों के पारंपरिक उपचार एवं बस्तर के जंगल में मौजूद जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधियों का प्रदर्शन इस अवसर पर किया गया। वैद्यराज ने बताया कि प्राचीन भारत में इन्हीं जड़ी-बूटियों से विभिन्न रोगों का कारगर इलाज किया जाता था। हमारे आसपास के प्रत्येक पेड़-पौधे और उनकी जड़, तनों में औषधीय गुण विद्यमान रहते हैं। इस दौरान विभिन्न ब्लॉक से आए लोक नर्तक दलों के द्वारा पारंपरिक वेशभूषा में वाद्य यंत्रों की थाप पर लोक नृत्य, लोक गीत का प्रदर्शन किया गया।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष  भरत मटियारा, नगरपालिका परिषद कांकेर के अध्यक्ष  अरूण कौशिक, जिला पंचायत उपाध्यक्ष श्रीमती तारा ठाकुर, जिला पंचायत सदस्य सुश्री मृदुला भास्कर, जनपद पंचायत कांकेर की अध्यक्ष श्रीमती पूर्णिमा कावड़े, चारामा अध्यक्ष श्रीमती जागेश्वरी भास्कर, एसपी  निखिल राखेचा, जिला पंचायत के सीईओ  हरेश मंडावी, एसडीएम कांकेर  अरूण वर्मा, पूर्व सांसद  मोहन मंडावी, पूर्व विधायक श्रीमती सुमित्रा मारकोले, गोंडवाना समाज के संभाग अध्यक्ष  सुमेर सिंह नाग, सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष  कन्हैया उसेण्डी, गोंडवाना समाज के जिला अध्यक्ष  राजेश भास्कर, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास सुश्री जया मनु, जिला शिक्षा अधिकारी  रमेश निषाद सहित समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि एवं काफी संख्या में लोक नर्तक दलों के कलाकार व ग्रामीणजन मौजूद थे।
क्रमांक/107/सिन्हा