यीशु द्वारा क्रूस पर कहे गये अंतिम सात वचन-''हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं
इससे पहले
पहला शब्द: “हे पिता, उन्हें क्षमा कर, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)।
दूसरा शब्द: “... मैं तुम से सच कहता हूं, कि आज तुम मेरे साथ स्वर्ग में रहोगे” (लूका २३:४३)
तीसरा शब्द: “हे नारी, अपने पुत्र को देखो” और “अपनी माता को देखो” (यूहन्ना 19:26 ,27)।
दौरान
चौथा शब्द: “हे भगवान, मेरे भगवान, तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया है?” (मत्ती २७:४६ और मरकुस १५:३४)
उपरांत
पाँचवाँ शब्द: “मैं प्यासा हूँ” (यूहन्ना १९:२८)
छठा शब्द: “यह समाप्त हुआ” (यूहन्ना १९:३०)
सातवां शब्द: “हे पिता, मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों में सौंपता हूं” (लूका २३:४६)
यीशु की शारीरिक पीडा बहुत कष्टकारी थी। यह कोडे मारने से प्रारंभ हुई थी जिससे चमडी छिल कर गहरे घाव बन जाते थे। कई लोग तो ऐसे कोडे खाते खाते ही मर जाते थे। फिर, उन्होंने कांटो का ताज उनके सिर पर पहना दिया। उनकी कटपटी में गहरी सुईयां मानो गड गयी और पूरा चेहरा रक्तरंजित हो गया। उन्होंने उनके चेहरे पर थप्पड मारे, मुंह पर थूका, अपने हाथों से उनकी दाडी के बाल उखाडे । फिर उन्होंने उनके उपर क्रूस लाद दिया कि यरूशलेम की गलियों में से लेकर चले और कलवरी पर जहां उन्हें क्रूस पर चढाया जाना था, वहां पहुंचे। अंतत उनके हाथों में जहां कलाई और हथेली का जोड होता है और पैरों में कीलें ठोक दी गयीं। इस तरह कीलों से ठोककर उन्हें क्रूस पर चढाया गया। बाइबल का वचन है,
''जैसे बहुत से लोग उसे देखकर चकित हुए (क्योंकि उसका रूप) यहां तक (बिगड़ा) हुआ था कि मनुष्या का सा न जान पड़ता था और (उसकी सुन्दरता भी आदमियों की सी न रह गई थी)'' (यशायाह ५२:१४)
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